Your cart is currently empty!
हिम्मत सिंह सिन्हा जी के व्यक्तित्व का सांस्कृतिक पक्ष
हिम्मत सिंह सिन्हा जी के व्यक्तित्व का सांस्कृतिक पक्ष
हिम्मत सिंह सिन्हा जी के व्यक्तित्व का सांस्कृतिक पक्ष– आधुनिक कुरुक्षेत्र के मानुष-रत्नों में प्रोफेसर हिम्मत सिंह सिन्हा जी का नाम अग्रगण्य है। हिम्मत सिंह सिन्हा जी केवल एक सरकारी कर्मचारी ही नही अपितु सामाजिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक पक्षों के साथ-साथ व योगमय जीवन को जीने वाले व्यक्तित्व थे। हिम्मत सिंह सिन्हा जी के विषय में लिखे गये अनेक विचारों, पत्रों, आलेखों, शोध पत्रों के अध्ययन के साथ-साथ में हिम्मत सिंह सिन्हा जी के द्वारा लिखे गये साहित्य व संदेशों के अवलोकन के पश्चात मै इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि सिन्हा जी विभिन्न दर्शनों के तुलनात्मक अध्येता होने के पश्चात भी स्वयं के जीवन को भारतीय संस्कृति के अनुसार ही जीने में विश्वास रखते थे। वे अपने जीवन को परहित हेतु खपाने में विश्वास रखते थे। सिन्हा जी का इस बात में दृढ़ विश्वास था कि सम्पूर्ण विश्व में भारत की विशेषता उसकी संस्कृति से ही है। भारतीय ऋषियों की परम्पराओं के अनुसार ही हिम्मत सिंह सिन्हा जी ने अपने जीवन का उद्देश्य परोपकार को बनाया । जिस प्रकार परोपकाराय फलन्ति वृक्षा:, परोपकाराय वहन्ति नद्य: । परोपकाराय दुहन्ति गाव: परोपकाराय सताम विभूतय: ।। अर्थात ‘वृक्ष परोपकार के लिए ही फल देते हैं, नदियां परोपकार के लिए ही बहती है, गायें परोपकार के लिए ही दूध देती है उसी प्रकार सज्जनों का जीवन व उनकी सम्पत्तियाँ भी परोपकार के लिए ही होती है’ इस भावना को आधार बनाकर के उन्होंने अपने जीवन का मूल मन्त्र ‘ हरने को पर व्यथा निबिड़ तम , जल रे जीवन दीपशिखा सम’ इस वाक्य को बनाया और अपने जीवन को छात्रों के कल्याण में व समाज के हितचिंतन में लगा दिया। परोपकार के लिए जीवन जीना भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है। महाभारत में स्वयं वेदव्यास ने कहा है कि परोपकार पुण्य के लिए होता है व परपीड़ा पाप के लिये होती है । हिम्मत सिंह सिन्हा जी ने परोपकार के मार्ग पर चलकर भारतीय संस्कृति का ही अनुकरण किया हैं । इसके अतिरिक्त उन्होंने जीवन में कभी भी संग्रह नहीं करने का निर्णय लिया और स्वयं की उदरपूर्ती के अतिरिक्त जो कुछ भी संपत्ति, धन इत्यादि था उसे देने में व पर-कल्याण में लगा दिया। ऐसा करके उन्होंने अष्टांग योग की अपरिग्रह संस्कृति का ही अनुसरण किया है। हिम्मत सिंह सिंन्हा जी ने भारतीय संस्कृति के समस्त पक्षों का अध्ययन किया था इसलिये वे यज्ञ की परम्पराओं व यज्ञ की वर्तमान दशा पर भी स्वयं का मत रखते हैं। सिन्हा जी ने मानव कल्याण हेतु यज्ञ के मर्म को समझा व वर्तमान में यज्ञों की कठिनता व समय अनुसार अनुपलब्धता (कलयुग जोग जग्य न जाना) को देखते हुये भक्ति को ही परम मुक्ति का मार्ग समझा । उन्होंने रामानंद के भक्ति मार्ग को सरल व सर्वजन के कल्याण हेतु उपयुक्त समझा। तुलसीदास कृत रामचरितमानस को उन्होंने अखंडता ,एकता, पवित्रता व भक्ति का सागर माना है । इसलिये सिन्हा जी का परम निष्कर्ष है कि भक्ति ही स्वतंत्र सकल गुणों की खान है ।
इसके अतिरिक्त राम के जीवन का उनके जीवन पर विशिष्ट प्रभाव रहा। वे रामचरितमानस के नियमित अध्ययन से जुड़े हुये थे । इसके साथ ही राम को भारतीय संस्कृति की एकता के संस्थापक मानते थे। उनका कहना था कि उत्तर से दक्षिण तक को जोड़ने का काम राम ने किया है।
सिन्हा जी के अनुसार भारतीय संस्कृति व शुचिता-
हिम्मत सिंह सिन्हा जी शुचिता, शील व सेवा भाव को संस्कार समझते थे । संस्कार से युक्त व्यक्ति संस्कृत होता है और संस्कृत व्यक्ति ही भारतीय संस्कृति का निर्माण करता है। सिन्हा जी संस्कृति को पुस्तकों का विषय व थ्योरी का विषय नहीं मान करके व्यावहारिक व अनुभवजन्य ज्ञान मानते थे। वो ये स्वीकारते थे की भारत की मेकाले प्रदत्त शिक्षा पद्दति में सांस्कृतिक मूल्यों का पूर्ण अभाव है, यह भारत की पीढ़ी को संस्कृति से दूर कर रही है इसीलिये शिक्षा भारतीय मूल्यों व सिद्धांतों के अनुसार होनी चाहिये।
हिम्मत सिंह सिन्हा जी ने भारतीय संस्कृति के विविध आयामों व पक्षों को तीन भागों में बताते हुए मानदंड तय किये है। उन्होंने कहा की वाणी की शुचिता, भोजन की शुचिता व सम्बन्धों की शुचिता ही व्यक्ति को संस्कृत बनाती है। वाणी की शुचिता पवित्र वातावरण का निर्माण करती है। भोजन की शुचिता मन की निर्मलता व पवित्रता निश्चित करती है (जैसा अन्न वैसा मन्न)। सम्बन्धों में शुचिता नारी के प्रति सम्मान उत्पन्न करती है व व्यभिचार की भावना को प्रकट होने से रोकती है। दुनिया के विभिन्न देशों में कहीं पर भी इस प्रकार की शुचिता देखने को नहीं मिलती जिस प्रकार की शुचिता भारतीय सम्बन्धों में देखने को मिलती है । भारतीय संस्कृति में प्रत्येक व्यवहार के लिए शब्द है- स्त्रियों के प्रति भारतीय परिवेश में परस्पर व्यवहार हेतु जिस प्रकार के संबोधन शब्द मिलते हैं वैसे शब्द पूरी दुनिया में अन्यत्र कहीं भी प्राप्त नहीं होते । यहां माता, बहन, भाभी, भाभी की बहन, बुआ, बुआ की मां, बहन सबके लिए पृथक-पृथक शब्द है जो कि सम्बन्धो में शुचिता बनाने में सहायक होते हैं। वे तुलनात्मक दृष्टि उपस्थापित करते हुये कहते है कि पाश्चात्य देशों की तरह यहाँ सभी के लिए केवल unty शब्द नहीं है अपितु क्षेत्रानुसार पृथक पृथक शब्द है। इसी प्रकार की मर्यादा पुरुषों के विषय में भी देखने को मिलती है। सभी के केवल uncel शब्द नहीं होकर व्यवहार हेतु पृथक पृथक शब्द हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय संस्कारों में, व्यवहारों में व तीज-त्योहारों में अनेक प्रकार के इस प्रकार के सम्बन्ध, रीति-रस्म, नेग आदि बने हुये हैं जिनसे भेदभाव समाप्त होता है व सम्बन्धों में शुचिता की स्थापना स्वत: बनी रहती है। सिन्हा जी नारी की शुचिता को भारतीय संस्कृति की विशेषता मानते थे। वे भारतीय स्त्रियों द्वारा किये जाने वाले व्रतादि का पूर्ण समर्थन करते थे, व व्रतों को स्वास्थ्य रक्षा व पवित्रता का हेतु मानते थे। सिन्हा जी वस्तुत: भारतीय संस्कृति को जीते थे।
हिम्मत सिंह सिन्हा जी इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि भारतीय संस्कारों में व संस्कृति में जो- जो भी व्यवहार हो रहा है वह सब मानव कल्याण के लिये ही है ।
सिन्हा जी वैदिक आदर्शों व आदेशों को संस्कृति का भाग मानते थे। वेदों में जो-जो भी कहा गया है कि परस्पर भाई-भाई से द्वेष नहीं करें, बहन-बहन से द्वेष नहीं करें, माता सबसे पवित्र शब्द है, माता गुरु है इस प्रकार के वैदिक तथ्यों को सिन्हा जी भारतीय संस्कृति का महत्त्वपूर्ण भाग मानते है। सिन्हा जी का मानना था कि भारतीय संस्कृति में संस्कार दैनिक-व्यवहार में स्पष्ट दिखाइए पडते हैं और ऐसा होना भी चाहिए अन्यथा हमारी संस्कृति भी अन्य संस्कृतियों की भांति किताबों तक ही सीमित होकर रह जायेगी व धरातल पर कहीं दिखाई नहीं देगी ।
हिम्मत सिंह सिन्हा जी व भारतीय वेशभूषा व संस्कृति-
प्राय: देखने में आता है कि जहाँ सारल्य होता है वहाँ वैदुष्य नहीं होता व जहाँ वैदुष्य होता है वहाँ सारल्य नहीं होता परन्तु ये दोनों गुण एक साथ हिम्मत सिंह सिन्हा जी व्यक्तित्व में उपस्थित थे । हिम्मत सिंह जी ने विभिन्न पाश्चात्य संस्कृतियों की चपेट के माहौल में जीवन जीने के बाद भी स्वयं की वेशभूषा को कभी नहीं त्यागा। वे आजीवन धोती व कुर्ता पहन के जीवन जीने वाले थे। वे वस्त्रों के अनावश्यक संग्रह को भी उचित नहीं मानते थे। उनके पास केवल तीन जोड़ी धोती व कुर्ते थे। वे अति-साधारण चप्पल पहनकर ही अपना जीवन गुजारते थे। उनके पास नियमित विश्वविद्यालय आवागमन हेतु एक साइकिल मात्र थी। जहाँ आज के समय में प्रोफेसर धोती-कुर्ता, साइकिल आदि के जीवन जीने को पिछड़ापन समझते हैं वही हिम्मत सिंह सिन्हा जी ने आजीवन सरलता के साथ जीवन जीकर भावी पीढ़ी के समक्ष आदर्श प्रस्तुत किया है। हिम्मत सिंह सिन्हा जी ने आजीवन धोती और कुर्ता पहनते हुये ही नौकरियां की है। वस्त्रों के विषय में इस विचार के साथ वे स्वामी विवेकानन्द जी से भी जुड़े हुये थे, जिनका कहना था की पतलून कभी भी मनुष्य के स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं हो सकती अतः उन्होंने धोती को ही अपना प्रिय वस्त्र समझा। धोती पहन करके वे भारतीय स्वाधीनता को भी आगे बढ़ा रहे थे, जहाँ महात्मा गांधी का सपना था कि स्वदेशी वस्त्र भारतीय लघु उद्योगों के समर्थन में है व इन्हें अपनाया जाना चाहिए।
हिम्मत सिंह सिन्हा जी व भारतीय शिक्षा का स्वदेशीकरण–
हिम्मत सिंह सिन्हा जी इस बात को लेकर स्पष्ट रूप से अपना मत रखते थे की अंग्रेजी भाषा भारतीय बच्चों के परम कल्याण की भाषा नहीं है। हिम्मत सिंह सिन्हा जी शिक्षा के स्वदेशीकरण के क्रांतिकारियों में से एक थे। 1970 में उनके द्वारा लिखा गया एक लेख इस बात का प्रमाण है कि वे अंग्रेजी को भारतीय प्रतिभाओं के विकास के लिए उचित नहीं मानते थे। हिम्मत सिंह सिन्हा जी शिक्षा के भारतीयकरण के पक्ष में थे उनका स्पष्ट मानना था की अंग्रेजी को पूर्णत: बन्द कर देना चाहिए क्योंकि भारत में जन्म लेने वाले बालक का जन्म केवल माता के गर्भ से ही नहीं होता अपितु उसका जन्म मातृभाषा की संस्कृति में होता है जहाँ मातृभाषा उसे स्वाभाविक तौर पर घेरे हुये रहती है इसलिये उसे शिक्षा अपनी मातृभाषा व हिंदी में ही देनी चाहिए। सिन्हा जी कला-संकाय व सामाजिक-विज्ञान के अध्ययन- अध्यापन, लेखन आदि का माध्यम तुरन्त हिन्दी में कर देने के पक्ष में थे, इसीलिये उन्होंने इस विषय में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.सोमनाथ सचदेवा जी को पत्र लिखा। हिम्मत सिंह जी भारतीय बच्चों को विदेशी भाषा में शिक्षा देना उसी प्रकार मानते है जिस प्रकार गोल छेद में चौकोर खूंटी या चौकोर छेद में गोल खूंटी डालने का प्रयास करना है।
हिम्मत सिंह सिंन्हा जी व मातृभाषा प्रेम-
हिम्मत सिंह सिन्हा जी उन शिक्षाविदों में शामिल थे जिन्हें अपनी मातृभाषा पर गर्व था। वे मनुष्य के बौद्धिक विकास के लिए मातृभाषा को अत्यावश्यक मानते थे। इसके अतिरिक्त मातृभाषा में अध्ययन- अध्यापन, मातृभाषा में व्यवहार के मर्म व मातृभाषा की शक्ति को समझते थे। सिन्हा जी का स्पष्ट मानना था की मातृभाषा स्वतन्त्रता व संस्कृति की भाषा है। मातृभाषा प्रत्येक प्रकार के ज्ञान को आत्मसात करने की सरलतम भाषा है। मातृभाषा में ही व्यवहार अतीव अनिवार्य है इसलिये वे स्वयं के हस्ताक्षर भी हिन्दी में ही किया करते थे । जहाँ आज के समय में भारत देश में अनेक लोग, यहाँ तक की पहली कक्षा के बच्चे से लेकर के प्रोफेसर तक भी हिन्दी में हस्ताक्षर करने में शर्म महसूस करते है वही सिन्हा जी चोडी छाती करके गर्व से मातृभाषा के व्यवहार को जीते थे , इसलिये उनके हस्ताक्षर भी हिन्दी में ही प्राप्त होते हैं ।
हिम्मत सिंह सिन्हा जी व सनातन मूल्य व गौरक्षा-
हिम्मत सिंह सिन्हा जी हिन्दू धर्म के विरुद्ध हो रहे षडयन्त्रों से परिचित थे। वे निर्भयता के साथ में अपनी बात रखते हुए उन सभी संप्रदायों व विधर्मियों का नाम गिनाते थे जो षड्यंत्र में संलग्न है। हिम्मत सिन्हा जी हिंदू धर्म व सनातन मूल्यों की रक्षा हेतु गौ-रक्षा को अत्यावश्यक मानते थे। सिन्हा जी महात्मा गांधी के उन विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे जिनका कहना था कि हिंदू तब तक सुरक्षित व संगठित रहेगा जब तक वह गाय के विषय में एकत्रित है। सिन्हा जी निर्भीकता के साथ धर्मान्तरण के विषय में बोलते रहे है। उनकी निर्भीकता के विषय में यह प्रसिद्ध है जो उन्ही के शब्दों में है, उनके शब्द थे – ‘प्रत्याघात बहुत कठोर है परन्तु आज इसकी आवश्यकता है’ ।
हिम्मत सिंह सिन्हा जी व भारतीय पर्व उत्सव –
हिम्मत सिंह सिन्हा जी भारतीय संस्कृति के प्रत्येक विषयों में, तीज त्योहारों में, विवाह आदि संस्कारों में, रीति- रिवाजों में, रस्मों के विषय में अपना वैज्ञानिक पक्ष रखते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि किसी भी परम्परा को वैज्ञानिक प्रमाणों के अभाव में ढोंग नहीं मानना चाहिये अपितु उसका मूल खोजने का प्रयास करना चाहिये। इसलिये हिम्मत सिंह सिन्हा जी अपने शिष्यों को जहाँ पर भी अवसर आये भारतीय तीज-त्योहारों व परम्पराओं का वैज्ञानिक मूल समझाने का प्रयास करते थे।
दीपावली के पर्व पर सिन्हा जी के द्वारा प्रेषित किए गए शुभकामनाओं के संदेश तो महान अर्थ व उपनिषदों की भावनाओं का विस्फोट है। उनके संदेशों में आमूलचूल परिवर्तन ला देने वाली भाषा विद्यमान है। वे दीपावली के पर्व को ऊर्जा का पर्व, प्रकाश का पर्व, आलोक का पर्व, ज्ञान का पर्व व अन्धकार के विनाश का पर्व मानते थे। इसलिए अपने इष्ट मित्रों के प्रति हमेशा ही निरालस्य होकर दीपावली के संदेश प्रेषित किया करते थे। उनके द्वारा प्रेषित किए गए संदेशों को पढ़कर के उन्हें उनके प्रति कृतज्ञ ज्ञापित करने का स्वाभाविक मन होता था। विद्या भारती कुरुक्षेत्र के द्वारा प्रकाशित किए गए हिम्मत सिंह सिन्हा स्मृति ग्रन्थ में उनके द्वारा प्रेषित किए गए दीपावली संदेशों का संग्रह उपस्थापित किया गया है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व हिम्मत सिंह सिन्हा जी के द्वारा ही लिखे गए विभिन्न संदेशों व विचारों के अध्ययन के पश्चात यह स्पष्ट होता है कि हिम्मत सिंह सिन्हा जी भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयामों के अनुकूल जीवन जीने में विश्वास रखते थे।
हिम्मत सिंह सिन्हा जी व गुरु शिष्य परम्परा –
हिम्मत सिंह सिन्हा जी अध्ययन- अध्यापन की गुरु शिष्य परम्परा के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अपने अध्यापन व जीवन काल में अनेक शिष्यों को अपने घर में रख करके अध्ययन करवाया। इसके साथ ही आवश्यकता के सामान भोजन आदि भी उन्हें उपलब्ध करवाते रहे। सिंन्हा जी विश्वविद्यालय समय के अतिरिक्त भी विश्वविद्यालय से बाहर जरूरतमन्द निर्धन छात्रों को निशुल्क अध्यापन करवाते थे। ऐसा करते हुए वे भारतीय संस्कृति की उस सनातन परम्परा का ही निर्वाह कर रहे थे जहाँ विष्णु शर्मा ने “नाहं विद्याविक्रयं ग्रामशतेन करोमि” कहकर विद्या के बदले में दिए जाने वाले धन व दान को त्याग दिया । उन्होंने हितोपदेश व पञ्चतन्त्र की शिक्षायें राजा के मूर्ख पुत्रों को प्रदान की। इस तरह सिन्हा जी भी विद्या के दान के बदले में कुछ भी लेना स्वीकार नहीं करते थे। सिन्हा जी की शिष्य परम्परा में आज कई शिष्य अनेक उच्च पदों पर कार्य कर रहे हैं। सिन्हा जी स्वयं दीपक की लौ के समान प्रज्वलित होकर स्वयं के प्रकाश से छात्र जीवन को प्रकाशित करने में लग रहे । सिन्हा जी गुरु शिष्य की परम्परों के मर्म को जानने वाले थे इसलिए उन्होंने स्वयं के निजी धन से छात्रों का शुल्क, भोजन, जरूरत की पुस्तक आदि सामग्रियां उपलब्ध करवाते हुए अध्ययन में सर्वदा सहायता की तथा कई छात्रों को अपने घर पर रखते हुये अध्ययन करवाया। छात्रों को घर पर रखकर विद्या का दान देना भारतीय संस्कृति व परम्परा का ही भाग है ।
उनके विषय में अन्य विद्वानों के भी विचार है कि भारतीय संस्कृति के अनुकूल उनका दृष्टिकोण परिपक्व था, नियंत्रित चित्तभूमि थी, उन्होंने आश्रम व्यवस्था को जीया, उन्होंने आचार्यों की जीवन- शैली को चरितार्थ किया, वे दार्शनिक थे, दूरदृष्टि वाले थे, वे नारी शिक्षा के पक्षधर थे, नयी पीढ़ी को जगाने वाले शिक्षक थे ।
यो धर्म संस्कृतिदर्शनतत्त्व-वेत्ता ।
‘’स: जयति योगी हिम्मत सिंह सिन्हा:’’।।
डॉ विनोदकुमारशर्मा
सहायकाचार्य, संस्कृत एवं प्राच्यविद्या संस्थान
कुरुक्षेत्रविश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

Leave a Reply