श्रीमद्भगवद्गीता में ईश्वर

श्रीमद्भगवद्गीता में ईश्वर

श्रीमद्भगवद्गीता में ईश्वर- श्रीमद्भगवद्गीता अनेक उपनिषदों, योगशास्त्र व महाभारत का सार है, श्रीमद्भगवद्गीता में स्मृति ग्रन्थों की भावना प्रतीत होती है। महाभारत में वैदिक ज्ञान का ही सार है। इस प्रकार श्रीमद्भगवतगीता में वैदिक ज्ञान ही सन्निहित है।  सम्पूर्ण विश्व के बुद्धिजीवियों व दार्शनिकों ने यह स्वीकार किया है की श्रीमद्भगवद्गीता वह सरल व स्पष्ट ग्रंथ है जो  बिना किसी भेदभाव, सम्प्रदाय आदि के उल्लेख के मानव जाति के कल्याण के नियम और सिद्धांतों को प्रतिपादित करती है।  श्रीमद्भगवद्गीता संपूर्ण विश्व में सर्वमान्य व सार्वभौमिक ग्रन्थ है । इसीलिये श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धांतों की प्रासंगिकता सर्वत्र व सर्वकालिक है।

भारतीय दर्शनशास्त्र व योग शास्त्र की परंपराओं में ईश्वर के स्वरूप का विवेचन स्पष्ट रूप से किया गया है श्रीमद् भागवत गीता भी भारतीय दर्शन पर योग शास्त्र का एक अनुपम अद्वितीय ग्रंथ है जिसमें ईश्वर के स्वरूप का विवेचन किया गया है । श्रीमद्भागवत गीता अर्जुन व कृष्ण के बीच में हुए संवाद का एक ग्रंथ है जिसमें कृष्ण को भगवान व अर्जुन को उनका सखा व शिष्य कहा गया है श्रीकृष्ण अर्जुन को विषाद व मोह की अवस्था में कर्तव्य का उपदेश प्रदान करते हैं । जब अर्जुन कर्तव्य कर्मों व धर्म धर्म आत्मा श्रद्धा यज्ञ माया आदि के विषय में अत्यधिक प्रश्न करता है तब श्री कृष्णा उसे अपना दिव्य स्वरुप दिखाते हैं जिसे ही परमात्मा स्वरुप अथवा विश्वरूपदर्शन अथवा ईश्वरस्वरूप कहा गया है। श्रीमद् भागवत गीता के अनुसार ईश्वर के स्वरुप व गुणों का निर्धारण करने के लिए हम कुछ आयाम स्थिर करते हैं

ईश्वर सामान्य दृष्टि से अज्ञेय है-

विषाद व  मोहग्रस्त अर्जुन को विभिन्न योग मार्गों के द्वारा कर्तव्य दृष्टि प्रदान करने के उद्देश्य से कृष्ण अर्जुन को उपदेेश प्रदान करते हैं। गीता के संवाद से ही स्पष्ट है कि कृष्ण अर्जुन के समक्ष भगवान् के रूप में स्थित है जबकि वह अर्जुन को अपना ईश्वरीय स्वरूप दिखाते हैं जो की अर्जुन अपनी सामान्य व भौतिक चक्षुओं से देखने में असमर्थ था, स्वयं भगवान कृष्ण उसे कहते हैं कि तुम इन अपनी भौतिक आंखों से मेरे ईश्वरीय स्वरूप को देख नहीं पाओगे इसलिए मैं तुम्हें दिव्यचक्षु प्रदान करता हूं(दिव्यं ददामि ते चक्षु पश्य मे योगमैश्वरम् ११|८) । वास्तव में दिव्यचक्षु दिव्य ज्ञान अथवा बौद्धिक दृष्टि को ही कहा गया है जिससे वह भगवान के वास्तविक स्वरूप को जान पाता है अथवा समझ पाता है।

ईश्वर समस्त कर्मों व यज्ञों का अधिष्ठाता है-

श्रीमद्भगवद्गीता वेदों में व  ब्राह्मण ग्रन्थों में ईश्वर जो स्वरूप कहा गया ह वही स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीता में भी निश्चित किया गया है। वेदों व ब्राह्मण ग्रंन्थों में ईश्वर को यज्ञ के अधिष्ठाता के रूप में प्रतिपादित किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी ईश्वर को  यज्ञ के अधिष्ठाता के रूप में ही प्रतिपादित किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में विविध प्रकार के यज्ञ यथा- योगयज्ञ, द्रव्ययज्ञ, ज्ञानयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ का उल्लेख है(४|२८), इन सभी  यज्ञों का लक्ष्य व फल ईश्वर की उपासना ही है। यज्ञों का सम्बन्ध वेद से है व वेद का सम्बन्ध ईश्वर से है।  योगयज्ञ, द्रव्ययज्ञ ज्ञानयज्ञ आदि समस्त यज्ञों के अनुष्ठान से मनुष्य ईश्वर का ही अनुष्ठान करता है क्योंकि ये समस्त यज्ञ ईश्वर के नियम से संबंधित है। ईश्वर ही समस्त यज्ञों का भोक्ता व स्वामी है(अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ९|२४)।

 योगयज्ञ- विभिन्न प्राणायाम,श्वास, व आसनों के अभ्यास से संबंधित यज्ञ योग यज्ञ कहलाता है।

 द्रव्ययज्ञ- घृतादि हवनीय पदार्थों के समर्पण, व दानादि से संबंधित अनासक्ति भाव से किया जाने वाला द्रव्य यज्ञ है।

स्वाध्याययज्ञ- नियमित रूप से उचित काल में उचित आसन आदि के विधान से स्वयं के ही स्वरूप को जानने का अभ्यास करना स्वाध्याय यज्ञ है। कुछ आचार्य स्वयं के द्वारा अभ्यास करते हुए शास्त्रों को जान लेने को भी स्वाध्याय यज्ञ कहते हैं परंतु स्वाध्याय यज्ञ के विषय में सर्वाधिक प्रसिद्ध अर्थ है कि स्वयं के स्वरूप को जानने का अभ्यास करना।

ज्ञान यज्ञ- स्वाध्याय यज्ञ ही ज्ञान यज्ञ का मूल कहा गया है। ज्ञान यज्ञ को सभी यज्ञ में सर्वश्रेष्ठ कहा गया है (श्रेयान्द्रव्यमयाज्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञ: परन्तप ४|३३)

ज्ञानयज्ञ की उपासना से कर्मबंधन पुनः संभव नहीं है (सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ४|३३ ) , इसलिए ईश्वर के सबसे निकट ज्ञान यज्ञ को ही कहा गया है। ज्ञान का स्वरूप अत्यधिक सूक्ष्म है जिसका दर्शन  स्वाध्याय व तत्वदर्शी गुरुओं के उपदेश से होता हैं(उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिन: तत्त्वदर्शिन:४|३३) । स्वाध्याय का अभ्यास व गुरुजनों से उपदेश श्रद्धा अथवा इंद्रिय निग्रह के बिना संभव नहीं है इसलिए ज्ञान यज्ञ की साधना हेतु श्रद्धावन होना भी आवश्यक है(श्रद्धवान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: ४|३९)।

यहां कह गए सभी यज्ञों से आत्मा के स्वरूप को जानने में सहायता मिलती है और आत्मा के स्वरूप को जानना ही परमात्मा अथवा ईश्वर के स्वरूप को जानना है इसलिए कहा गया है समस्त यज्ञों का लक्ष्य व फल ईश्वर ही है।

ईश्वर  के विविध रूप – 

ईश्वर का अन्त है न मध्य है न आदि है(नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिम् ११|१६ ) । ऐश्वर्य व विशेष शक्तियां ईश्वर के ही अंश से उत्पन्न है। गीता के दशम अध्याय में विशेष शक्तियों को ही विभूतियां कहा गया है। ये विभूतियां यहां ( श्रीमद्भगवतद्गीता के दशम अध्याय में )  कुछ नाम मात्र बताई गयी है, वस्तुतः इन विभूतियों का अन्त नहीं है परन्तु सार रूप में यहां कुछ शक्तियों का नाम ग्रहण किया गया है। श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि है अर्जुन यों तो मेरे स्वरूप के विस्तार का कोई अंत नहीं है फिर भी तुम समझना चाहे तो यह समझो की सभी प्राणियों के हृदय में जो आत्मा है वह मैं ही हूं, आकाश में उदित होने वाले सभी द्युतिमान पिन्डों में सूर्य में ही हूं, नक्षत्रों में चंद्रमा हूं, देवताओं में इंद्र हूं, इंद्रियों में मन हूं, समस्त प्राणियों में चेतना हूं, पर्वतों में सुमेर हूं, महर्षियों में भृगु, वाणी में ओम, सभी यज्ञों में जप यज्ञ, स्थावरों में हिमालय हूं, सभी पुरोहितों में बृहस्पति हूं, पांडवों में अर्जुन हूं, वृष्णि वंश में उत्पन्न में वासुदेव, सिद्धों में कपिल मुनि, रुद्रो में शंकर, यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर, अष्टवसुओं में अग्नि हूं, सेनापतियों में स्कंध, देवर्षियों में नारद, गंधर्वों में चित्ररथ, हाथियों में ऐरावत हूं, सभी जलाशयों में समुद्र, नदियों में गंगा, वृक्षों में  पीपल वृक्ष में ही हूं। पशुओं में सिंह गांयों में कामधेनु, जलचरों मकर में ही हूं, पक्षियों में गरुड़, मनुष्यों में राजा सांपों में वासुकी शास्त्रधारियों में राम, शस्त्रों में वज्र, छन्दों  गायत्री, अक्षरों में अकार , समासों में द्वंद्व, मासों मे मार्गशीर्ष, कवियों में शुक्राचार्य मैं ही हूं।

इस प्रकार श्रीकृष्ण अपने ईश्वरीय स्वरूप का परिचय देने हेतु कुछ विभूतियों को उसके समक्ष प्रकट करते हैं।

विभूति शब्द का अर्थ संस्कृत शब्दकोश के ग्रन्थों के अनुसार चमत्कार अथवा शक्ति विशेष अथवा ऐश्वर्य होता है। ईश्वर यह शब्द का अर्थ है ईश्वर का भाव जिसमें विद्यमान हो ऐश्वर्य अनेक हो सकते हैं परंतु ईश्वर एक ही है।एक ही के अनेक हो जाना विभूति है। इस प्रकार ईश्वर की अनेक अनेक शक्तियां है, अनेक विभूतियां है जिनका वर्णन यहां अर्जुन को ईश्वर की सर्वसम्पन्नता व सर्वशक्तिमत्ता दिखाने के उद्देश्य से किया गया है।

 ईश्वर सर्वशक्तिमान है-

भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के समक्ष ईश्वरीय स्वरूप को उद्घाटित करने के लिए ही विभिन्न मार्गो को प्रकट करते हैं। विभिन्न प्रकार के सांख्य योग, ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग आदि समस्त योग ईश्वर के ही स्वरूप को परिभाषित कर रहे हैं। ईश्वर समस्त भूतों का कारण है, संसार नश्वर है जबकि ईश्वर अनश्वर है अविनाशी है व सभी जगह व्याप्त है। संपूर्ण संसार इसी के भीतर समाहित है(अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित: १०|२०)।

गीता में ईश्वर के विविध नाम-

 श्रीमद्भगवद्गीता में ईश्वर को पुरुषोत्तम, परमात्मा, परमेश्वर ओम् तत् सत् (ऊं तत् सत् इति निर्देशो ब्रह्मण: त्रिविध: स्मृत: १७|२३ ) इत्यादि नाम से जाना गया है। गीता में एकाक्षर ऊं को परब्रह्म अथवा ईश्वर का नाम कहा गया है (ऊं इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् माम् अनुस्मरन् ८|१३ )। श्रीमद् भागवत गीता के अनेक अध्यायों में सैकड़ो से भी ज्यादा बार कृष्ण के विभिन्न नाम का उल्लेख ईश्वर के अर्थ में आया है सर्वनाम शब्दों(अस्मद्, युस्मद्, तत् आदि) से भी ईश्वर ही लक्ष्य किए गए हैं।

वेद में भी कहा गया है कि एक ही परमात्मा को अनेक नाम से कहा जाता है ।इसी का समर्थन स्मृति ग्रन्थों में भी मिलता है । मनुस्मृति में कहा गया है कि इस परम तत्व को परमेश्वर को कोई मनु, कोई इंद्र, कोई अग्नि इत्यादि नाम से जानता है अर्थात एक ही परमेश्वर के अनेक स्वरूप है।

ईश्वर के कार्य-

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार ईश्वर ही संपूर्ण जगत का कर्ता व विनाशकर्ता ह। सर्वान्तर्यामी  वह ईश्वर ही संसार को चक्रवत चला रहा ह। ईश्वर ही गुण कर्म के अनुसार चतुर्वर्ण  की सृष्टि करता है( चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश: ४|१३)। ईश्वर संपूर्ण सृष्टि के अध्यक्ष के रूप में अवस्थित होकर  समस्त प्रकृति व चराचर की रचना करता है (मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम् ९|१०)। गीता के अनुसार ईश्वर ही संपूर्ण ब्रह्मांड का उत्पत्तिकर्ता, पालन कर्ता व संघारकर्ता है। संपूर्ण जगत में जितनी भी योनियां सम्भव है उन समस्त योनियों का बीज रूप पिता ईश्वर ही ह (तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदपिता १४|०४) ।

18वें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को जिसकी शरण में जाने के लिए कह रहे हैं वह परम तत्व ईश्वर ही है कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि “मामेकं शरणं व्रज”(१८|६६) है अर्थात मेरी ही शरण में जाओ,श्रीकृष्ण अर्जुन के समक्ष  उपस्थित होने पर भी यह नहीं कह रहे हैं कि मेरी शरण में आओ अपितु जिस परम तत्व की शरण में जाने को ही कह रहे हैं वह परम तत्व ईश्वर ही है। श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं के लिए जिस प्रकार की विशेषणों का प्रयोग किया है वे विशेषण किसी शरीर में होना संभव नहीं है वे सारे गुण ईश्वर के ही है। जगत उत्पादन का सामर्थ्य , चतुर्वर्ण की सृष्टि यह सभी गुण किसी साकार में संभव नहीं है अपितु ईश्वर के ही गुण है। कृष्ण अर्जुन की समक्ष शंकर रूप में उपस्थित होकर अपनी निराकार गुना को ही लक्ष्य करके संबोधित कर रहे हैं।

18 अध्याय में कृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं की समस्त प्राणियों के हृदय में ईश्वर ही उपस्थित है (ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति १८|६१) ।

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