श्रेणी: Blog

  • भारतीय संस्कृति के प्रसार में प्राच्य विद्या संस्थाओं का योगदान

    भारतीय संस्कृति के प्रसार में प्राच्य विद्या संस्थाओं का योगदान भारतीय संस्कृति के प्रसार में प्राच्य विद्या संस्थाओं का योगदान- अनेक वर्षों की पाश्चात्त्य दासताओं से धूलि-धूसरित हो चुकी भारतीय संस्कृति, इतिहास, ललित कला व साहित्य को पुनः प्रक्षालन करके स्थापित करने में प्राच्यविद्या संस्थानों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। अनेक शब्दकोषों व प्राच्य विद्या के…

  • ग्रहशान्ति की अवधारणा

    ग्रहशान्ति की अवधारणा भारतीय ज्योतिष का यह वैशिष्ट्य है कि इसमें ग्रह की गणित के अलावा फल की कल्पना भी की गई है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र का फल ही शुभाशुभ फल का आदेश करना है।. यथा– “ज्योतिश्शास्त्रफलं पुराणगणकैरादेश इत्युच्यते” शुभ व अशुभ फल का निर्णय ग्रहों की आकाशस्थ स्थिति के अनुसार तय किया जाता है।…

  • शुद्धिकरण/शौच का सामान्य परिचय

    शुद्धिकरण/शौच का सामान्य परिचय मनुष्य को आध्यात्मिक बनाएं रखना ही भारतीय संस्कृति का लक्ष्य है, आध्यात्मिक बने रहने के लिए निरन्तर पूजा-पाठ, जपकर्म, अनुष्ठान कर्म और यज्ञों का विधिवत् अनुष्ठान करने की शास्त्रीय परम्परा है। यज्ञ अनुष्ठान की शास्त्रीय परम्परा और यज्ञ अनुष्ठान की विधियाँ बिना शुद्धिकरण के फलदाई नहीं होती है, इसलिए शुद्धिकरण अत्यावश्यक…

  • वास्तु का सामान्य परिचय

    वास्तु का सामान्य परिचय “वसति अस्मिन् इति वास्तु” अर्थात जिसमें रहा जाये वह वास्तु है। प्रत्येक निवास योग्य भूखण्ड में एक देवता की कल्पना की गई हैं और वह देवता “वास्तु पुरुष “के नाम से शास्त्रों में प्रतिष्ठित है। जिस प्रकार जल के अधिष्ठातृ देवता वरुण हैं, वृष्टि के अधिष्ठातृ देवता इन्द्र है, अग्नि के…

  • पाठ का परिचय व प्रकार

    पाठ का परिचय व प्रकार वैदिकमन्त्रों, पुराणों, काव्यग्रंथो व स्तोत्रों से सम्बन्धित श्लोकों का पाठ करने की शास्त्रीय परम्परा है। मन्त्र व स्तोत्र संस्कृत भाषा के विशुद्ध व्याकरण के नियमों से बंधे होते हैं, इसलिए इनके उच्चारण, स्मरण, मनन, पठन इत्यादि में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। उच्चारण में त्रुटि घातक व अर्थ…

  • गृहप्रवेश का सामान्य परिचय

    गृहप्रवेश का सामान्य परिचय गृहप्रवेश व गृहारम्भ में अन्तर – गृहप्रवेश और गृहारम्भ दोनों ही अलग-अलग विषय है। गृहारम्भ में घर के निर्माण का आरम्भ किया जाता है, जबकि गृहप्रवेश में घर में निवास के लिए प्रवेश किया जाता है। गृहारम्भ हेतु शुभ मुहूर्त में नींव की खुदाई करके 5 शिलाओं के पूजन के पश्चात्…

  • मंत्र जप का परिचय व भेद

    मंत्र जप का परिचय व भेद जिस प्रकार शरीर की बाह्य शुद्धि के लिए स्नान किया जाना आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मा की शुद्धि के लिए सन्ध्या वंदन आदि नित्य कर्म का किया जाना आवश्यक है। सन्ध्या वन्दन के उपरांत अतिरिक्त सकारात्मक ऊर्जा, आत्मबल की वृद्धि, भय, शोक और मन के संताप के नाश के…

  • पूजा विधि का सामान्य परिचय

    पूजा विधि का सामान्य परिचय भारतीय वैदिक संस्कृति के अनुसार यज्ञ को सम्पादन करना ही विभिन्न प्रकार के शास्त्रों का प्रमुख लक्ष्य है। यज्ञ फल के भेद से कई प्रकार के होते हैं, अर्थात् उनके फल भी अलग-अलग होते हैं। इन यज्ञों के विधिवत् सम्पादन हेतु सम्बन्धित देवताओं का आवाह्‍न के बाद पूजा का क्रम…

  • छन्द परिचय

    वसन्ततिलका (वर्ण=14) लक्षणम्-  “उक्ता वसन्ततिलकातभजा: जगौ गः”। तभजा:=तगण, भगण, जगण, जगौ-जगण, गुरु ग:=गुरु, उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी: दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति। दैवं निहित्य कुरु पौरुषामात्मशक्त्या  यत्ने कृते यदि न सिद्धयति कोऽत्र दोषः।।                मालिनी (वर्ण=15) लक्षणम् -“ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः”। (नगण नगण मगण यगण यगण) प्रथमयति:= 8 द्वितीययति:= 7 उदाहरणम्  स हि गगनविहारी, कल्मषध्वंसकारी,  दशशतकरधारी, ज्योतिषां मध्यचारी।…

  • छन्द-परिचय

     छन्दपरिचय-  “नियतवर्णयुक्तं नियतमात्रायुक्तं वा वाक्यनिकरं वा छन्द इति उच्यते” ।   “यदक्षरपरिमाणं तच्छन्द:”  अर्थात निश्चित वर्णों का समूह है वह निश्चित मात्राओं का समूह है अथवा निश्चित वाक्यों का समूह छंद कहलाता है अथवा जहां पर अक्षरों का परिमाण तय हो वह छंद कहलाता है पद रचनाओं में वाक्यों को पद्य अथवा श्लोकों में बांधने…

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