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लेखक: manojkumarvyas21
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भारतीय संस्कृति व गीता-
भारत में गीता अध्ययन की परंपरा- भारत में गीता अध्ययन की परंपरा- भारतीय संस्कृति व गीता- भारत के गुरुकुलों की परंपरा के समय में श्रीमद् भागवत गीता के नियमित अध्ययन व पाठ की परंपरा रही है भारत के युवा श्रीमद्भगवत गीता के नियमित पाठ व नियमित व्यायाम को अपना दिनचर्या में शामिल मानते थे।श्रीमद्भगवद्गीता का…
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वर्तमान शिक्षा व ब्रह्मचर्य
वर्तमान शिक्षा व ब्रह्मचर्य भारतीय संस्कृति व “ब्रह्मचर्य” – भारतीय संस्कृति व “ब्रह्मचर्य” – विद्याध्ययन की गुरुकुल परम्पराओं में छात्रों हेतु अनिवार्य नियम, ब्रह्मचर्य रहा है। ब्रह्मचर्य के बिना जीवन की अन्य अवस्थाओं का दुखयुक्त होना निश्चित है, इसलिये श्रौतसूत्रों व धर्मग्रन्थों में ब्रह्मचर्य को प्रथम आश्रम माना गया है। मानव जीवन के प्रमुख उद्देश्यों की…
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भारतीय ज्ञान परम्परा में वेद
भारतीय ज्ञान परम्परा में वेद- वेद शब्द का अर्थ है ज्ञान का समूह । वेद शब्द संस्कृत के विद धातु से बना हुआ है जिसका अर्थ है ज्ञान , अर्थात वेद वह शब्द भंडार है जिनमें ज्ञानिधि समाहित है । वेद का विभाजन वेदव्यास ने किया, वेदों का विस्तार व विभाजन करने के कारण ही…
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भारतीय संस्कृति व ज्ञान परम्पराओं में पर्यावरण संरक्षण की चेतना व अवधारणा
भारतीय संस्कृति व ज्ञान परम्पराओं में पर्यावरण संरक्षण की चेतना व अवधारणा भारतीय संस्कृति के विविध आयामों में व परम्पराओं में जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश आदि पांच महाभूतों के प्रति जो आदि भौतिक दृष्टि है, जो देवत्व की परिकल्पना है वह पर्यावरण संरक्षण का मूल आधार है । भारतीय संस्कृति व परंपराओं के अनुसार…
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भारतीय संस्कृति व परंपराओं में गाय का महत्व
समस्त दुधारू पशुओं में गाय का विशिष्ट महत्व है इसलिए गुणवत्ता की दृष्टि से को दुग्ध को अमृत कहा गया है भारतीय संस्कृति में गाय के विशेष महत्व को ध्यान रखते हुए गाय को को के समान कहा गया है माता के समान कहा गया है गाय के पंचगव्य पदार्थों के महत्व व गुणवत्ता को…
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भारतीय संस्कृति व परम्पराओं में तुलसी
भारतीय संस्कृति व परम्पराओं में तुलसी- भारतीय संस्कृति में पर्यावरणीय संचेतना के अनूठे उदाहरण व साक्ष्य है। यहां तुलसी आदि पौधों को भी पूज्य कहा गया है तुलसी का आयुर्वेदिक महत्व होने के कारण यह नियमित रूप से भारतीय पूजा पद्धति वह आचमन चरणामृत आदि में शामिल की गई है। स्वास्थ्य की दृष्टि…
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गर्भाधान संस्कार में काल का महत्त्व
गर्भाधान संस्कार में काल का महत्त्व- गर्भाधान यह सर्वप्रथम संपादित किया जाने वाला संस्कार है यह संस्कार ही सभी संस्कारों में मुख्य व मूल कहा गया है । गर्भाधान संस्कार के संपादन में काल का बहुत महत्त्व है। इस संस्कार के बिना अन्य संस्कार का सम्पादन संभव ही नहीं है। इसलिए गर्भाधान को…
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पञ्चोपचार-पूजा
पञ्चोपचार-पूजा- आत्म शुद्धि मन्त्र आसनशुद्धि आचमन मंत्र माथे में तिलक लगाने का मंत्र संकल्प मंत्र आत्मशुद्धि मन्त्र– बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से निम्न मंत्रो के उच्चारण के साथ अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर जल छिड़कना चाहिये– ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः…
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संस्कृति में जलसंरक्षण
भारतीय ज्ञानपरम्परा व संस्कृति में जलसंरक्षण की चेतना- जल एक सीमित संसाधन है जो मानव के द्वारा बनाया नहीं जा सकता। जल के बिना जीवन की संकल्पना सम्भव नहीं है। सृष्टि की रचना में प्रयुक्त प्रथम तत्त्व जल ही था। भारतीय ज्ञान परम्परा व संस्कृति में जल को वरुण देवता का शरीर माना गया…
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भारतीयसंस्कृति परम्परा व सौलह संस्कार
भारतीयसंस्कृति परम्परा व सौलह संस्कार- भारतीय संस्कृति में व भारतीय धर्म ग्रंथो में संस्कारों की संख्या के भिन्न-भिन्न प्रमाण प्राप्त होते हैं। सर्व प्रसिद्ध प्रमाणिक मत महर्षि मनु का प्राप्त होता है जिनके अनुसार 16 संस्कार कहे गए हैं। इन संस्कारों में कुछ जन्म से पूर्व संपादित किए जाते हैं व कुछ जन्म के…
